Thursday, 24 December 2020

‘झाँसी की रानी’

स्कूल में जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम के बारे में पढ़ा था, तब ‘झाँसी की रानी’ लक्ष्मीबाई के बारे में पढ़ी पंक्ति ‘मेरी झाँसी नहीं दूंगी’ अब तक याद है। कुछ समय पहले क्रोसवर्ड बुक स्टोर में गई थी। जैसे ही नज़र पड़ी महाश्वेता देवी के बांग्ला उपन्यास ‘झाँसीर रानी’ का डॉ. रामशंकर द्विवेदी द्वारा हिन्दी में अनुदित ‘झाँसी की रानी’ पर, तुरंत खरीद ली। ‘खूब लड़ीं मर्दानी, वो तो झाँसी वाली रानी थी!

मात्र 26 वर्ष की उम्र में महाश्वेता देवी ने ग्वालियर के रणक्षेत्र में जीवन की आहुति देने वाली 22 वर्षीय रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी पर यह कालजयी उपन्यास लिखा, जो उनकी प्रथम रचना है। उपन्यास की भूमिका में महाश्वेता देवी ने लिखा है कि बचपन में एक दिन झाँसी की रानी की कहानी नानी ने सुनाई थी। लालटेन के धुंधले आलोक में उनके कोमल कंठ से सुनी यह कहानी एक आश्चर्यजनक रूप कथा की तरह लगी थी। उस दिन से ही झाँसी की रानी की कहानी उनके मन में उज्जवल रूप में अंकित हो गई। 1857 के क्रांतिकारी आंदोलन अथवा झाँसी की रानी के संबंध में हमारे पास सच्चे तथ्यों का एकांत रूप से अभाव है। ऐसे में इस उपन्यास को लिखने के लिए महाश्वेता जी ने अथक अध्ययन किया और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के विषय में व्याप्त तरह-तरह की किंवदन्तियों, तथ्यों और प्रामाणिक सूचनाओं पर आधारित यह जीवनीपरक उपन्यास लिखा। इस कृति में तमाम ऐसी सामग्री का पहली बार उद्घाटन किया गया है जिससे हिन्दी के पाठक सामान्यतः परिचित नहीं हैं। झाँसी की रानी पर अब तक लिखी गईं अन्य औपन्यासिक रचनाओं से यह उपन्यास बिलकुल अलग है क्योंकि इसमें कथा का प्रवाह कल्पना के सहारे नहीं बल्कि तथ्यों और दस्तावेजों के सहारे निर्मित किया गया है। 

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